मेरी कलम से
सब जाग रहे तू सोता रह
किस्मत को थामें रोता रह
जो दूर है माना मिला नहीं
जो पास है वह भी खोता रह
लहरों पर मोती चमक रहे
झोंके भी तुझ पर सिमट रहे
ना तूफान कोई आने वाला सब
तह तक गोते लगा रहे
लहरें तेरी कदमों में है
तू नाव पकड़ कर रोता रह
धूप अभी सिरहाने है
मौसम जाने पहचाने हैं
रात अभी तो घंटों है
बस कुछ पल दूर ठिकाने हैं
इतनी दूरी का तय कर आया
दो पग चलने में रोता रह
माना कि मुश्किल भारी है
पर तुझमें क्या लाचारी है
ये हार नहीं बाहर की है
भीतर से हिम्मत हारी है
उठ रहे यहां सब गिर गिर के
न उठ तू यूं ही लेटा रह
सब जाग रहे तू सोता रह
किस्मत को थामे रोता है ।।
-अतुल मौर्या

