कुछ रिश्ते आर्गेनिक होते हैं उन्हें ना खाद चाहिए ना पानी ना धुप चाहिए ना धरती वो पनपते हैं यूँ ही कहीं तंग गलियों में लुकाछिपी में की देखा यूँ ही और बस गयी दिल में या की अमरबेल जो जीवंत रहा कभी मेरी कभी तुम्हारी साख पर। पर इधर से रिश्तों के खेती के तरीके बदल गए हैं परंपरागत को छोड़ आधुनिक हो गए हैं मिलता है जमीन खाद उनको जिनका बाज़ार है बोये जाते हैं काटने के लिए नकदी फसल हैं आज के रिश्ते बाजार की तरह चढ़ते और उतरते हैं गाला फाड़ कर बोलियां लगायी जाती है और वो जो कमदामी रिश्ते हैं अब नहीं मिलते उनके लिए बैल और मजदूर जो अपने कंधों पर ढो कर पंहुचा दे खलिहान तक।