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हर किसी में तेरी छवि का ध्यान अब धरता हूँ मैं

हर किसी में तेरी छवि का ध्यान अब धरता हूँ मैं मिल न जाये कोई ऐसा ध्यान यह करता हूँ मैं मिल गयी कोई परस्पर रूप गुण प्रखर में प्रेम उन्नत हृदय दयालु सर्व गुण सम्पन में उन गुणों को फिर भी मैं कमतर कहूँगा हे प्रिये प्रेम तेरा कम किसी से यह नहीं होगा प्रिये प्रेम दीपक के लिए थे अग्नि मैं स्नेह तुम मैं आग जैसे जल रहा हो गया ह
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