कुछ अंधेरे यूँ भी रहने दो

हर शाम की मोड़ पर

लट्टुओं को क्या जलाना

कि शरारत आप ये करती नहीं हैं

और तोहमत सब इसी पर


स्याह कम तुम भी नहीं हो

बदमाश कम तुम भी नहीं हो

फिर हरकतों की बत्तियों पर

पेंच कब तुमने चढ़ाई


या की फिर छक से जलाकर

एक माचिस ज्ञान वाली

दूर कर पाए कभी तुम

आदतें अपनी सब काली


रौशनी के तुम पुजारी

लख ना पाये मैल मन के

जो दिखा वह रात ही था

लग गए तुम सूर्य बनने


लट्टुओं का जोर अब तो

रात है कमजोर अब तो

खो गयी इसकी लरजता

कम गयी इसकी महत्ता


मिट रहा है रात अब तो

खो गई वह बात अब तो

वह हवा जो झूमती थी

अल्हड़ों सी घूमती थी


अब कहाँ उनका ठिकाना

अब कहाँ वह ताना-बाना

रात को महसूस करना

चाँद तारों को सजाना


प्रेम वह यौवन हृदय का

रात की रानी के जैसे

जो रहा सहमा सा दिन में

खिल पड़ा सानिध्य तम के


ये अंधेरे मिट गए जो

जुगनुओं के खोजी बोलो

फिर कहाँ ढूंढोगे उसको

फिर कहाँ लाओगे उसको

              -अतुल