सरकार जी है तुमसे गुहार जी

खल रही है लाठियों की मार जी

रूल फूल कैसे कैसे हो बना रहे 

ज़िंदगी हो जा रही उधार जी 

नियम नीति रीति प्रीति 

यह है सब कुछ राजनीति 

तुमको कछु ना दिखत है

हाँ मगर नहीं हैं हमहुँ इतना गंवार जी

हमहि भेजौ दिल्ली मा

और हमहि का सुनौ ना

यही से रोज़ रोज़ हो रहा बवाल जी

और उठ रहे हैं तुमपै सवाल जी

आनाज पानी माटी मोल 

पर ना निकले मुँह से बोल 

साहेब हम सबै का सुनौ और करौ कुछ कमाल जी

देश का तबहि होई उद्धार जी 

सरकार जी है तुम से गुहार जी