"कितना  खाली  लगता है रिश्तों के मर जाने पर

 अपने खाबों का सौदा कर शहरों से घर जाने पर

 कोई  नहीं  समझ सकता बेचैनी उन दीवानों की

 जिसने  घुटने  टेक  दिए  रस्मों  की  दुकानों पर"