"मृत्यु और प्रेम" सुनो प्रिये क्यूँ चिंतित होती हो मृत्यु होना कोई साधारण बात नही रही बात मेरी तो मुझको क्या समझा तुमने मैं कहाँ स्वयं में रह पाऊँगा गर मिला तुम्हारा साथ नहीं क्या तुम्हे याद है वो दिन जब हमने तुम्हे एक अंगूठी पहनाई थी और तुम्हारी आॅखों ने एक अमर कहानी गायी थी उसी अमर कहानी का एक किरदार हमें समझना ले आना एक खिलौना उसका नाम 'अतुल' रखना याद तो मुझको भी आयेगी भूल भूलईया सी बांहो की जहाँ पहुचने की खातिर मिन्नत करनी पड़ती राहों की सोंचो वो पल जो तुमने मुझको केवल मुझको सौंपें हैं सोंचो उस जीवन को जिसको जीकर हम बार बार उसमें लौटे हैं हम कितना भी कोशिश कर लें होनी तो होती जायेगी क्रिया - कर्म के अनुपात में 'मृत्यु' दंड सुनायेगी और इस धरती पर जो आया उसका मरना निश्चित है पर समय कौन कितना भोगेगा बस यह बात अनिश्चित है जीवन के जो साल गिन रहा उसको कौन याद रखेगा जो पल में कीर्तिमान रचते उनको इतिहास लिखेगा आखिर मैंने भी तुमको पाकर एक कीर्तिमान रचा है भले ही जीवन मेरा अब कुछ वक्त बचा है मुझे पता है मेरे ना होने पर तुम मुझे और ज्यादा चाहोगी और रहेंगी सांसें सांसों से जितना दूर उतना पास मुझे पाओगी और अगर मानव, मानव की मृत्यु का इतना शोक मनायेगा तब तो जीवन चक्र घूमकर एक बिंदु पर रूक जायेगा हे प्रिये! तुम्हे तो मालूम है आना जाना तो लगा रहता है मृत्यु तो नियम प्रकृति का है जो सदैव शाश्वत रहता है जीवन की सीमाओं में प्रेम कभी नहीं बंधता जो है अमर प्रकृति में उस पर जोर नहीं चलता मेरी ही तरह स्वयं तुम भी भाग्य को मत कोसो प्रियसी हम सबकी जीवन मृत्यु का निर्धारण करती है नियति हे मृत्युंजय! हे महाकाल! प्रियसी को लेना तुम संभाल मैं चलता हूँ कोई और लोक इस लोक में है जीना मुहाल ..... अतुल वर्मा