किधर भी जाऊं वो खुश रहेंगे 

बिखर भी जाऊं वो खुश रहेंगे 

मैं मर भी जाऊं वो खुश रहेंगे 

लगा के ताला जुबां पे मेरी 

मेरा खुदा बन वो खुश रहेंगे 


जरा भी उनको शर्म नहीं है

कि मेरे जख्मों पे गम नहीं है

लूटाते रहते हैं खुद को दुनिया में

मेरे लिए बस समय नहीं है


बहुत ही हल्का तूफान आया

नकाब चेहरे से उसने हटाया 

मैंने देखा एक असलियत को 

चलो हो जो भी समझ तो आया


गरजते बादल से दावे उनके 

किया अनसुना मुझको सुनके 

बड़े खिलाड़ी निकले 'साहब' 

चलाया मुझ पर एक तीर चुनके 


मैं ऐसा पहले कभी नहीं था

खराब था पर 'कमी' नहीं था

मेरा तो वो एक ख्वाब थे पर

उनको मुझपे यकीन नहीं था


न हम तुम्हारे न तुम हमारे

फिर क्यूँ एक दूजे के ख्वाब मारें

ये झूठे चोले ये झूठी सकलें

चलो कम से कम अब तो उतारें


सफर अकेले ही काटना है

ये जख्म खुद से ही पाटना है

किसी सहारे से कितना चलेंगे

ये रास्ता भी खुद से नापना है


ये अपनापन ये रिश्तेदारियाँ

सबकी सब हैं बेकार बातें

है करना जो भी करो स्वयं से

सबको मिलती हैं 'बीमार रातें'


ये जिस्म जिसमें अकेले हम हैं

ये आंखे जिनकी पलकें नम हैं

नहीं करेंगी सिकायत तुमसे

गर 'आज' तुम हो तो हम 'कल' हैं


सफर अकेले ही काट लेंगे

दर्द खुद में ही बांट लेंगे

पहरों का जब हिसाब होगा

अपने हिस्से में रात लेंगे


ये चाँद तारे सब हों तुम्हारे

आसमां भी तुम्हें पुकारे 


हमारा क्या है हम हैं किनारे 

जहां समंदर भी थपेड़े मारे 


इसी से विचलित नहीं हुआ मैं 

रोका तुमने नहीं रुका मैं  


सफर हमारा सफल होगा 

आज नहीं तो कल होगा



@ poetry by atul verma