कुछ नहीं बदला तुम्हारे बाद भी
सबका सब है पहले जैसा आज भी
सिर्फ कुछ एक आईने और कमरे हैं
जिनमें घुटते रहते हैं कुछ राज भी
जब से तुमने रास्ता बदला है अपना
तब से ही मैं बन गया एक खंडहर और ताज भी
हाँ अकेले तो जिए हम उम्र भर
कम से कम कुछ वक्त जी लें साथ भी
गल्तियाँ जो हो गयीं सो हो गयीं
खामियां जो मुझमें थी सब सो गयीं
चूर चूर हो गया हूँ इस सफर में
थाम लो अब मुझको और मेरा हाथ भी
@ poetry by atul verma


