ये दिवाली भी तुम बिन मना ली जायेगी
शाम तो रौशन रहेगी रात खाली जायेगी
जब दिखेंगे चाहने वाले अपने अपनो संग
आँख में आँसू रहेंगे याद तेरी आएगी
जी नहीं लगता है मेरा काँच के इन शहरों में
बेवजह की खामोशी मुझको फिर तड़पाएगी
गाँव से दूरी बहुत है और मजबूरी बहुत है
शाम जब दीवा जलेगी घर की सुध उलझायेगी
लग रहा है और कुछ दिन जिस्म को जलना पड़ेगा
.और फिर एक रोज वो मेरे सामने आ जाएगी
जिंदगी जिस तरफ भी फैसला करना है कर
क्या है थोड़ा जल्दी हो तो जिंदगी मिल जायेगी

