कभी पापा के लाड़ में पली परी होती है
तो.. कभी माँ के सब कामों में सहेली होती है
कभी दोस्त बन कर भाई को राह दिखलाती है
तो.. कभी परिवार की सारी ज़िम्मेदारी निभाती है
जो कभी.. सुबह निकलती हुई धूप की तरह चमकती है
और कभी.. शाम को बहती ठंडी हवा सी लगती है
जो करीब होने पर अजीब सा एहसास दिलाती है
और.. जिस के बिना कवि की कविता अधूरी रह जाती है
जो ज़िंदगी भर किसी के हर सुख दुख में साथ रहती है
और कभी.. कुछ ना बोल कर भी हर ग़म को सहती है
कभी माँ बन कर ममता का आँचल सजाती है
और कभी.. एक नयी गृहस्थी को फिर से संवार जाती है
तो क्यूँ.. हम उसे इस दुनिया में जीने नहीं देते ?
और क्यूँ उस के पैदा होने पर खुश नहीं होते ?
क्यूँ हमें वो उम्र भर एक बोझ सा महसूस होती है ?
वो तो किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं होती है
इस दुनिया को चलाने वाली वही तो एक लड़की होती है