फिर याद आती है वो सुबह जिसमें तुम मेरे साथ थी मौसम की वो पहली पहली बरसात थी एक ही छाते के नीचे कभी मैं भीगा था और कभी तुम भीगी थी फिर काँपते हुए तुमने बांह मेरी पकड़ी थी ठंड से ही सही कभी तो तुम मुझ से लिपटी थी । तुम कभी गालों को मेरे दबाती थी कभी बालों को मेरे सहलाती थी मेरी हर ना को तुम अपनी हाँ में मनवाती थी पसंद नापसंद से तुम मेरी हर तरह से वाकिफ थी रूठ जाऊँ जो अगर मैं मनाने में भी तुम माहिर थी । फिर क्यूँ गयी तुम मुझे छोड़ के ? ऐसी भी मेरी क्या गलती थी ? बस एक बार तो बता देती मुझ में क्या कमी अब रह गयी थी ? अब तेरे इंतज़ार में मेरी ज़िंदगी यूं ही कट जाएगी एक ही सवाल रह गया बाकी की “ क्या तुम वापस लौट कर आओगी? ”