जन की लगाय बाजी गाय की बचाई जान, धन्य तू विनोबा ! तेरी कीरति अमर है। दूध बलकारी, जाको पूत हलधारी होय, सिंदरी लजात मल – मूत्र उर्वर है। घास–पात खात दीन वचन उचारे जात, मरि के हू काम देत चाम जो सुघर है। बाबा ने बचाय लीन्ही दिल्ली दहलाय दीन्ही, बिना लाव लस्कर समर कीन्हो सर है।