याद है तुमको, जब नवरात्रि आती थी,
एक सूट चाहिए, कहने में भी कतराती थी,
हफ्तों तक बाज़ारों में घूम-घूम समान जुटाता,
बिंदिया, महावर, गजरे, झुमके लेकर मैं आता,
क्या जरूरत है इन सब की, कहकर आँखें दिखलातीं थी,
मैं ढूंढ़ता एक अनजानी ख़ुशी, जो उनके चेहरे पर उतर आती थी।
#क़लम✍
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