हर मुलाक़ात इतेफ़ाक़ नहीं होती हर कहानी आई गयी बात नहीं होती लिखी होगी दास्ताँ लिखने वाले ने पर हर ज़िन्दगी सौगात नहीं होती कौन है यारो मुक़म्मल यहाँ हर कश्ती में तो पात नहीं होती क्यूँ ढूंढता फिरता है मुक़द्दस यहाँ क्या यहाँ दिन के बाद रात नहीं होती जो मिली है क्यूँ नहीं जी लेता उसीमें सबकी ज़िन्दगी तो उम्दा हयात नहीं होती