
बचपन में लिखा था कभी मेरे दोस्त के बारे में। आज भी याद है मुझे उस कहानी के बारे में। अलग ही थे पर फिर भी, एक थे हम। दो नहीं चार नहीं बल्कि बहुत सारे थे हम। आज भी याद है मुझे वह दिन मेरे, जब ना मालूम थी दोस्ती फिर भी थे दोस्त मेरे। आज मालूम हुआ मुझे, के दोस्ती तो वही थी।
पहचान तो नई सी ही थी, फिर भी हर कहानी हमारी एक दूसरे से जुड़ी थी। ना कुछ पाने की ख्वाहिश थी तब, और ना कुछ खोने का ग़म था। जब वोह साथ थे मेरे, ना मुझे किसी बात का डर था।
दो दिल एक जान सुना है इश्क़ में होता है, पर दोस्ती में तो उससे भी गहरा रिश्ता हमें मिला है। साथ में रहते थे, जब कुछ पलों के लिए ही मिल जाते थे। झगड़े भी हमने सौ बार किए थे, और ना जाने एक पल में कैसे भूल भी जाते थे। शाम को अलग अलग होकर हम जब पाठशाला में फिर सुबह मिलते थे, एक दूसरे की जान बन जाते थे।
ना जाने कैसे वह पल बिखरते चले गए। ना जाने कैसे हम इतने बड़े हो गए। ना जाने किस वजह से बढ़ती गई दूरि
