बचपन में लिखा था कभी मेरे दोस्त के बारे में। आज भी याद है मुझे उस कहानी के बारे में। अलग ही थे पर फिर भी, एक थे हम। दो नहीं चार नहीं बल्कि बहुत सारे थे हम। आज भी याद है मुझे वह दिन मेरे, जब ना मालूम थी दोस्ती फिर भी थे दोस्त मेरे। आज मालूम हुआ मुझे, के दोस्ती तो वही थी।

       पहचान तो नई सी ही थी, फिर भी हर कहानी हमारी एक दूसरे से जुड़ी थी। ना कुछ पाने की ख्वाहिश थी तब, और ना कुछ खोने का ग़म था। जब वोह साथ थे मेरे, ना मुझे किसी बात का डर था।

    दो दिल एक जान सुना है इश्क़ में होता है, पर दोस्ती में तो उससे भी गहरा रिश्ता हमें मिला है। साथ में रहते थे, जब कुछ पलों के लिए ही मिल जाते थे। झगड़े भी हमने सौ बार किए थे, और ना जाने एक पल में कैसे भूल भी जाते थे। शाम को अलग अलग होकर हम जब पाठशाला में फिर सुबह मिलते थे, एक दूसरे की जान बन जाते थे। 

ना जाने कैसे वह पल बिखरते चले गए। ना जाने कैसे हम इतने बड़े हो गए। ना जाने किस वजह से बढ़ती गई दूरियां हमारी, क्यू हरपल खुले जा रही थी रिश्तों की गुत्थी हमारी। 

    वह पागल सी बाते, बेवजह ही मुस्कुराना, और चॉकलेट का भी मिल बांट के खाना। कैसे हवा हो गई यह कहानी सारी, ना जाने किसने कह दिया अब तुम्हारी बारी।  

अब यह सब जैसे मुमकिन ही नहीं है, एक वैसा दोस्त भी अब किस्मत में नहीं है। बड़े होकर कुछ पाया नहीं है, जो थे दोस्त मेरे अब मेरे नहीं है। ज़िंदगी की धूप में, सब बचपन मै ही बड़े हो गए, हम भी धीरे धीरे उन्हें ढूढते ही रह गए।

खोया नहीं है हमने, एक दूसरे को कभी, आज भी साथ है हम, पर बात उस बचपन कि नहीं।

     दोस्त तो वहीं है पर दोस्ती बदल गई, दुनिया की समझ में समझदार हो गई। वोह रिश्ता जिसका नाम है दोस्ती, उस दोस्ती पे इंतजार की मोहर लग गई। हमें आज भी तलाश है उसकी, पर चाहते है कि, अब वह खुद ढूंढे मुझे और कहे, के यही वो दोस्त मेरी।

एक दिन ऐसा भी आए के हर कोई समझे इस रिश्ते को, जिसका नाम है दोस्ती और जिसका किरदार है दोस्त।