आंखे खोल ए मुसाफिर 

है लंबा रास्ता सामने 

मंजिल ताके दूर बैठी 

तू ठहरा विश्राम में 

आंधियों सी गर्जना कर 

कल- कल बेह जा नीर सा 

हर एक स्वास को थाम कर यूं

संयम रख तू पीर सा 

मंजिल को झुकना पड़ेगा 

क्षमता का तू ध्यान कर 

जथरांगीनी को कर प्रज्वलित

अब इक क्षण ना आराम कर

करने दे उपहास सबको ,अश्रु ना ला आंख में 

कायरता है बैठी दांव लगाए , इसी पल की तलाश में 

अब जो डिगा तू पथ से अपने 

क्या मिशाल छोड़ जाएगा 

गिर जा , लड़ जा , फिर जतन कर 

संघर्षी तू कहलाएगा,,,,,