मुख़्तसर सी जिंदगी को क्यों किसी के नाम कर दें

हर निगाहें टिक जाए हम पर आज ऐसा वो काम कर दें


बेनूर सी यह शामें है बेरंग सी है ये सहर 

जो चाहे हम तो आज ही ये स्याह रातें फ़ाम कर दे


करते हैं हम तौबा दूर से ही मयखाने को 

मिट जाए इस जहां की तिश्नगी जो खुद को हम जाम कर दें


उठे जो निगाहे जमाने की शोलों सी मक़बूल 

ना पहुंच पाए तपिश ऊंची इतनी आशियाने की बाम कर दें


✍मक़बूल_कटनीवाला