मुश्किलें तो है ज़िंदगी में मग़र कोई ग़िला नही,
हँसता चेहरा सबने देखा कैफ़ियत का पता नही।
उसका क्या जो मिला ख़ुदा की नेमतों से,
आँसू बहाते है सब उसके लिए जो असल मे कभी मिला नही।
आपस के ही मसलें है जिसमें उलझ चुकें है सब,
जब सब छूटने लगा तब पता लगा इंसान हूँ कोई ख़ुदा नही।
तमाम उम्र ग़लतफ़हमियों में रहें कि शतरंज के बादशाह है हम,
जब हारें तब पता चला कि प्यादे से हम कोई जुदा नही।


