है अंतःकरण निराश बहुत
आशा का चिराग जल जाएगा
कर तन को चेतन तू अपने
चिंगारी मन में सुलगाता चल
है अंधकारमय मेघ घने
तू सुकुमार सवेरा पा लेगा
है जोर तमस का पर डर मत
तू अपनी ज्योति जलाता चल
है कंटक पथ सुनसान डगर
सुगम सुपथ भी आएगा
तू थाम ले संकरी पगडंडी
बस चलता चल बस चलता चल
है समय का ये संध्या पहर
फिर रात्रिकाल भी आएगा
तू मान इसे जीवन का पहर
मत टाल इसे बस जीता चल
दिन में सिर पर है सूर्य हस्त
हर दृश्य नयन को भाएगा
ले चंद्र देवता से आशीष
तू रातों को अपनाता चल
दिखने लगेगा नभ में प्रकाश
और अंत में मंजिल आएगी
आभार तिमिर का आभार निशा का
आभार जुगनू का गाता चल
- आशुतोष सोनी


