अल्फ़ाज़ मेरे जज़्बात मेरे कुछ इस कदर लिखता हूं।

मन से लिखता हूं,मन पे चुभता हूँ।


भभकती ज्वाला बदन में लिये घर से निकलता हूँ।

न में बारिश से डरता हूँ ,तूफानों से तोह हर रोज़ लड़ता हूँ।।


वाकिफ है मेरे कदम मंजिलों से मेरे

शायद इसीलिए कभी ओझल नहीं होते।

बशर्ते इतनी है बस मेरे रास्ते मखमल के नहीं होते।।


शायर नहीं हूं बस आशिक़ हूँ अपनी मंज़िलों का

उन्हें हर हाल में पाना चाहता हूं,गिरना मंज़ूर हैं बस रुकना नहीं चाहता हूँ।