स्मृतियों से आगे
मुझको नहीं आता स्मृतियों में खो जाना,
यादों के पुल बनाना।
अचरज में डाल देता है,
तुम्हारा यादों में खो जाना।
कभी इस कल में तो कभी उस कल में खोकर, तुम आज को भुला देते हो।
यादों में गोते लगा कर स्मृतियों को सहेज कर तुम जीवन काट देते हो।
वास्तविकता से नज़रें मैं भी नहीं मिला पाता हूं, पर क्या करूं यादों के झूलों पर भी नहीं झूल पाता हूं।
मैं तो मन के विचारों,समय के सवालों में उलझा रहता हूं।
स्मृतियों की छाया से भागता रहता हूं।
पर तुम तो यादों के झरने में तर होकर,
यथार्थ को धुंधला कर जीवन जीते रहते हो।
सच से मुंह मोड़ कर,
मृग की भांति विचरते रहते हो।


