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 ये शाम की  सुहानी हवाएं, छुपी जिनमें  ख़ामोश सदाएँ याद दिलाती है। कुछ लम्हें जो रेत पे हमने  लिखे, जिनके अब कोई  निशाँ नही है। एक ख़ामोश छत उससे लगी हुई और भी छतें, परिंदों के सिवा जिनपे कोई भी होता नही है। मैं वक़्त बे वक़्त अपनी बेख्याली में कुछ लफ़्ज़ों को संग लेकर घण्टो बैठा रहता हूँ। मैं लेखक नही हूँ मुझे ले
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