ये शाम की
सुहानी हवाएं,
छुपी जिनमें
ख़ामोश सदाएँ
याद दिलाती है।
कुछ लम्हें
जो रेत पे हमने
लिखे,
जिनके अब कोई
निशाँ नही है।
एक ख़ामोश छत
उससे लगी हुई
और भी छतें,
परिंदों के सिवा
जिनपे कोई भी
होता नही है।
मैं वक़्त बे वक़्त
अपनी बेख्याली में
कुछ लफ़्ज़ों को
संग लेकर
घण्टो बैठा रहता हूँ।
मैं लेखक नही हूँ
मुझे लेखकी का इल्म
नही है,
बस लफ़्ज़ों को
इधर उधर करता
रहता हूँ।
कोई नज़्म,कोई गीत,
कोई ग़ज़ल,कोई शे'र,
कोई मिसरा,
किसी के दिल
में उतरता है,
उसके तसव्वुर की
तमाम यादों को
ताजा करता है,
उसके दिल के
एहसास,
जो दब
गए थे कल,
ताजा कर जाता है।
और असल एहसास
जहां से निकलता है
वहां वापस चला
जाता है,
अगली किसी नई
कल्पना के लिए।