आंख नम है होंठ सूखे है
ज़िस्म नगें है पेट भूखे है।
रोज चलते हम मंजिलों तक
मगर मंज़िलों पे सिर्फ़ रस्ते है।
कोशिशें दम तोड़ जाती है
दिल को पत्थर किये जाते है।
एक सच बस सियासत का
लोग जितने है सब झूठे है।
हमने उगाए है सूरज कित्तने
हासिल उनसे हमें, ये अंधेरे है।