अगर, इश्क़ है, तो सिला, भी तो दे-

मेरे, ज़ख़्म को, तू दवा, भी तो दे

ठहर जाऊँ मैं, सीने में तेरे

साँसों में घुल जाऊं मैं-

याद जो करे, प्यार से मुझे

राहों में, मिल जाऊँ मैं

तो दिल,में कहीं, तू जगह, भी तो दे

इश्क़ गर कोई, जुर्म- ख़ता है

मुजरिम, मुझे मान ले-

इस गुनाह में, एक नशा है

मुजरिम, मुझे मान ले

तो फिर, मुझे, तू सज़ा, भी तो दे

भूल जाऊँ मैं, ऐ मेरे हबीब,

मुमकिन, अभी ,ये नहीं-

ग़म भुलाऊँ मैं, ऐ मेरे हबीब

मुमकिन, अभी ये नहीं

मगर, ये हो, तू दुआ, भी तो दे

_अशरफ फ़ानी