जज्बात लिखने से कोई मोहब्बत नहीं समझता।

मेरे जज्बात को कोई जज़्बात नहीं समझता।


वकत कटे हैं मैंने भवरो को देख शाम सवेरे

पर शायद वह बीता वक़्त भी मेरे वक्त की शिद्दत को नहीं समझता।


कितनी दफ़ा दफ़न किया खुद को खुद की ही नज़रों मे पर अब तो मेरा जमीर भी मुझे लायक नहीं समझता।


ठुकराया है उन अपने ही चोटों ने,

जिन्हें शायद कोई मरहम लगाने के काबिल नहीं समझता।


सब जानते हैं कि यह रूह ही है अपना हमदम,

पर फिर भी उसके दर्द को नहीं समझता।


रोक रहा हूँ अपनी कलम को लगाने से विराम,

क्योंकि मैं अपनी कविता की गहराई को नहीं समझतां,