उमर भी क्या पैगाम है,

शायद इस दुनिया में आने का अंजाम है ।

अंजाम तो ताउम्र हम दुनिया को दिखा रहे थे,

पर शायद इस अनजान के रास्ते,

हम अपने इंतखाब की ओर जा रहे थे।

इंतखाब का वास्ता तो मेरी आखरी सांसो से है,

पर इन सांसो को भी आस एक लंबी आरामदायक करवट से है,

ऐसी करवट जो बस थाम लेती है -

उन अनेको बेचैन कांपती पंखुड़ियों को । 

यह बेचैनी शायद, उस मुरझाने वाले आंधी का प्रतीक है - 

जिससे आम का मौसम तो रह जाता है,

पर नन्हें-नन्हें मंजर झड़ जाते हैं।

आम तो हमारे थाल में सज ही जाता है 

पर वो नन्हें-नन्हें मंजर हवा के झोंके में कहीं छुप जाते हैं।

या यूं कहो कहीं दफन हो जाते हैं। 

मेरी तरह ही आम के मंजर भी जिंदगी के मेले में हजारों साथी होते हुए भी अकेले लड़खड़ा जाते हैं -

न किसी की उंगली उन्हें थामती है,

न किसी की उंगली उन्हें थामना चाहती है,

और अकेले ही इस आंधी को झेलते - झेलते मेरे तरह वह भी कहीं थक कर खुद ही गिर जाते हैं।

क्योंकि गिरना भी तो खुद ही के कदमों पर है,

दूसरे तो वहां भी गिरा देख कर अनदेखे हो जाएंगे।