दग़ा की बात तो ये है, दग़ा हम भी नहीं करते, सभी से आजकल लेकिन वफ़ा हम भी नहीं करते. हमारी निभ नहीं पाती जगत के देवताओं से, ये मुद्दा और है उनको ख़फ़ा हम भी नहीं करते. मोहब्बत का तक़ाज़ा था नमाज़ी हो गए हम भी, कसम लेलो कहीं यूँ ही झुका हम भी नहीं करते. दुखी होता है वो मन में, हमेशा चोट पहुंचा कर, पलट कर इसलिए शिकवा गिला हम भी नहीं करते. बुरा लगता है बच्चे शाम को जब देर से लौटें, उन्हें खुश देख कर लेकिन मना हम भी नहीं करते. खुला रखते हैं पिंजरा तो परिंदे लौट आते हैं, वो पिंजरे में रहें ये कामना हम भी नहीं करते. जुदा हो के भी उसकी फ़िक्र में रहते हैं शामिल हम, कभी एहसास से उसको जुदा हम भी नहीं करते. निगाहें आसमाँ पर हैं, ज़मीं पर पाँव हैं लेकिन, जो कहते हैं वो करते हैं, उड़ा हम भी नहीं करते. हमारी चाह इतनी सी है बस इंसाफ़ मिल हाए, हमें सबकुछ मिले ये प्रार्थना हम भी नहीं करते. वो आखिर भाई है होली पे मिलने क्यों नहीं आया, अजब तहज़ीब है इसका गिला हम भी नहीं करते.