नज़रे मिलाकर तसल्ली नहीं मिली तुम्हे
बोलो तो गले आके लग जाऊ क्या
सुख - दुःख, ख़ुशी गम सब तुज़से ही है
इनके लिए कोई और रिश्ता बनाऊ क्या
फरमाईश आज़माइश नुमाईश सब झेली
अब क्या अपनी नज़रो में गिर जाऊ क्या
रिवाज़ रस्म रसूक कसम सब हमसे है
अब इनकी खातिर तुज़से बिछड़ जाऊ क्या
मेरी बात सच्ची है थोड़ी कड़वी लगेगी
अब झूठ के लिए मीठी छुरी बन जाऊ क्या
एहसास ए मोह्हबत के लिए एक गुलाब काफी हे
अब क्या एक और ताजमहल बनवाऊं क्या
तेरे इश्क़ में खत हमने कमाल लिखे है
अब क्या किसी ग़ालिब को बुलवाऊ क्या
मॅहगाई के दौर का आशिक हु मशगूल हु
अब मोह्हबत में दिवालिया हो जाऊ क्या


