वह सुबह

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मैं फिर खुले आसमान के नीचे घूमना चाहता हूं ,

मैं फिर वही जीवन पाना चाहता हूं


जब एक दिन खुल जाएंगी बंद खिड़कियां , फिर होगा सवेरा 

उस भोर का सूर्य फिर पुरानी ठाठ बाट से निकलेगा-

सुनहरी किरणों को बिखेरता हुआ सर्वत्र 

मुस्कुराएगा सूरजमुखी का फूल ,

शीतल पवन पीपल के हरे पत्तों को खड़काएगी-

निकल जायेगी बेला,चमेली, कनेर के फूलों को सहलाकर,

आम के पेड़ पर बैठी कोयल की कूक को गुंजायमान करती हुई !


रुई जैसे सफेद बादलों से बरसेगा अमृत इतना

कि बुझ जायेगी असमय जलनेवाली चिताओं की आग,

दुःख की गागर टूटकर सुख की सरिता में बह जायेगी -

प्रकाश की आहट से मन एक बार फिर प्रमुदित होगा

तब एक नया दिन होगा, कालरात्रि के भय से मुक्त !


इस सृष्टि का भूषण कहते हैं जिसे , 

मैं वह मनुष्य हूं :

श्रांत किन्तु आशान्वित,

इसलिए उस सुबह को देखना चाहता हूं,

मैं फिर एक जीवन जीना चाहता हूं 


*****अशोक (07.05.2021)