उसका दुःख

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वैसे तो दुःख प्रकट हो ही जाता है आंसुओं से

लेकिन दुःख जब पहाड़ सा हो जाता है,

आंखों से निकले आंसू भी तब 

गालों पर आने से पहले ही सूखकर अदृश्य हो जाते हैं 


सब कुछ धुंधला और बेजान सा लगता है 

जब दशा और दिशा बदलने का वादा करने वाले

दूर तक भी नज़र नहीं आते ,

और हम जीने के लिए एक अदद संजीवनी 

खोजते ही रह जाते हैं ,

उधर जीवन की लड़ी टूट जाती है !


स्नेहीजन और मित्र इस तरह साथ छोड़ रहे हैं 

कि अब उसे किसी बात की फिक्र नहीं होती

क्योंकि वह अब एक गहन तंद्रा में है -

सब कुछ लुट चुका है 

शून्य हो चुका है उसके लिए ;

कुछ भी कहो उसे - 

विक्षिप्त या स्थितिप्रज्ञ, यह तुम्हारा दृष्टिकोण है !


*** अशोक(24.04.2021)