नज़र
*****
छुट्टियों के बाद एक बार फिर
बेटा शहर जाने के लिए निकलता है,
द्वार पर खड़ी बूढ़ी मां
देर तक देखती रहती है उसे
जब तक इस गली के मुहाने तक जाकर
मुड़ नहीं जाता वह अगली गली में
यद्यपि बूढ़ी हो गई है मां -
और उसकी नज़र कमजोर हो चली है :
गली के उस छोर तक तो उसे चेहरे साफ दिखते भी नहीं,
फिर भी, उन धुंधले बिन्दुओं में भी
पहचान ही लेती है अपने बेटे का अक्स -
मां आखिर मां होती है !
*****
