वह न होती,

तो शायद कभी न जानता, 

कि खुद से हारने की शर्मिंदगी कैसी होती है; 

कि चट्टानी कसमों की रेत में धंसी 

अपराध बोध की जिंदगी कैसी होती है । 


वह न होती,

तो शायद कभी न जानता, 

कि भय के गर्भ में पली आस्था, 

आत्महत्या कर, फिर जन्म लेती है देर से । 

कि, जो जन्म लेती है 

बस परछाईं भर है, 

क्लीव निश्चयों की,

झांकती, संयमहीन वैसाखियों के ढेर से ।