गूंगे प्रवास के गुम चेहरे पर,

मास्क बाँध कर पूरा चुप !

दो आँखें भर लज्जित सपने;

भय, संशय के बादल घुप !


गठरी भर दुनिया व्यर्थ भले,

प्रतिबिम्ब दबाकर समय तले;  

कर आत्मसात उसको निज मन,

सूने पथ पर, करता क्रंदन ।  


भूखी, पर फिर जागी हिम्मत !

कई रात चली, परदेस छोड़;

अपनी मिट्टी, माँ का आँचल 

और गांव का अपना वाला मोड़ ।  


अब पहुँच वहाँ, यह भान हुआ,

इज्जत अपनी, अभिमान हुआ;

बोझिल पलकों में नज़र खिली,

फिर स्नेह टेक आवाज मिली !