उनको कटाक्ष करने दे,
अंतर जलने दे ।
अश्रुसिक्त संकल्प
निरंतर पलने दे ।
चिन्हित कर, हँस, चूम ,
बढ़े जो हाथ कटीले ।
शिव बन, सर्प दंश का विष,
एकाकी पी ले !
निश्चय के बिखरे अंग,
सभी तू लेना चुन ।
अट्टहास आशा की,
फिर से लेना सुन !
अट्टहास आशा की,
फिर से लेना सुन !
-- अशोक


