इस असमंजस भरे जीवंत में
कैसे खरा उतर पाऊंगी
जो हूँ, वो किसी को स्वीकृय नहीं
जो सब चाहते है वो मुझे स्वीकृत नहीं
मन , कर्म , कर्म के आधीन इस जीवन में
भौतिकी का सुख नहीं।
सूक्ष्म बिंदु मात्र के समान मेरा अस्तित्व
ढूंढ रहा वो मैं, जो सब मे मिल सके
अगले पड़ाव की शुरुआत हो गयी
मैं अभी भी फँसी उस भँवर में
सोच में डूबी मेरी ज़िंदगी
अब मुझसे क्या अलग चाहती है।
मेरे पाँव बढ़ते जा रहे हर अंधेरा किए पार
हर शिखर पर पहुंच कर
नए शिखर की तलाश में।
न पाँव थके न मै
नया पड़ाव कर रहा मेरी प्रतीक्षा
धैर्य की सीमा पार कर मेरी ओर
बढ़ा चला आ रहा।

