एक दिन मेरा माथा उस समय भन्नाया
जब मैं एक अत्यंत ही सेल्फ प्रोक्लैमेड राष्ट्रवादी व्यक्ति से जा टकराया
सोशल मीडिया पर वो रहता हरदम व्यस्त था
देश का फ्यूचर ब्राइट है यही सोच-सोच के पूरी तरह आश्वस्त था
विपक्ष की हर बात उसे लगती जोक थी
और सरकार की हर बात उसके लिए मास्टरस्ट्रोक थी
उस से बात कर न जाने क्यों, हर कोई अपना माथा फोड़ लेता था
कहने वाले कहते थे .... कि वो हर बात को सेना और सैनिकों से जोड़ देता था
खैर..
मेरे पास भी उस दिन काफी खाली टाइम था
और इस देश में चर्चा करना कहाँ कोई क्राइम था
हमने कहा कि भाई ये जो सरकार ने फैसला लिया है
इसने जनता को दर्द तो बड़ा दिया है
उसने सुना
सुनते ही मुझे पूरा गुस्से से देखा
और एक तर्क मेरे मुंह पर ज़ोर से फेंका
बोला
एक व्यक्ति सब कुछ छोड़-छाड़ कर देश के लिए जिया जा रहा है
एक बात सुन लो
ये जो भी किया जा रहा है देश हित के लिए किया जा रहा है
अब तक जो पिछलों ने जो बीमारी देश को लगाई है
ये उसी की कड़वी दवाई है
इंडिपेंडेंट इंडिया में जो चाहे वो कह सकते हो
अरे! देश के किये इतना नहीं सह सकते हो
जब तुम सिम से लेके शो की लाइन तक में खड़े हो जाते हो
तो देशहित की लाइन में लगने में क्यों चिल्लाते हो
फैसला ऐतिहासिक है, दम भरने लगा
बात बे बात पर फिर हर-हर करने लगा
मुझसे तो भई अब रहा नहीं जा रहा था
राष्ट्रवाद का यह रूप अब सहा नहीं जा रहा था
अपने आप को थोड़ा संभाला
मैंने भी एक काउंटर आर्गुमेंट उछाला
मैंने कहा कि भई अचानक हुई अनाउंसमेंट भले ही भारी थी
पर उसे लागू करने की पहले से कहाँ कोई तैयारी थी
ये लोग जो मास्टरस्ट्रोक का दम भर रहे है
कभी गिना भी है कितने लोग मर रहे है ?
खुद की ऐप पर कुछ ही प्रतिशत के वोट पाते हो
और सर्वे भवन्तु सुखिनः चिल्लाते हो
ये काले धन वाले कहाँ जकड़े जा रहे है
उल्टा पार्टियों के ही काले धन पकड़े जा रहे है
अपने ही पैसे पाने को लोग मरे जा रहे है
और पार्टियों के खजाने तो बेनामी चंदो से भरे जा रहे है
जिसे लग रहा है कि स्कीम से जनता कायदे में है
मैथेमेटिक्स लगाइए जनाब .. काला धन बताने वाला ज्यादा फायदे में है
वो खिसियाया...
खिसिया के पुछा.. आम आदमी वाले हो क्या ?
जो इतना चिल्ला रहे हो
बेवजह राई का पहाड़ बना रहे हो
जानता हूँ तुमको पुरे के पूरे नेगेटिव हो रखे हो
विकास से झुंझलाकर अपने होशो हवास खो रखे हो
अरे, कभी तो कुछ ऐप्रिसीशिएट कर किया करो
अपने ट्विटर एकाउंट में थोड़ी तो पाजिटिविटी भर लिया करो
मैं बोला.. मैं कहाँ पार्टी वाला मैं तो खुद ही त्रस्त हूँ
खुद ही देख लो
इस एटीएम की लाइन में सुबह से व्यस्त हूँ
मैं पार्टी वाला तो नहीं पर हाँ व्यक्ति आम हूँ
वक़्त बे वक़्त आता सभी के काम हूँ
ये दल चुनावों के समय मेरे आस पास ही मंडराते है
मेरी शक्ल दिखा के .. ये न्यूज़ चैनल वाले टी.आर.पी ले जाते है
आम आदमी तो बस मरा जा रहा है
लेकिन यहाँ तो डिजिटल इंडिया का दम भरा जा रहा है
आम आदमी को तो बस सताया जा रहा है
रिपीट लूप पर एक ही सपना सालों से दिखाया जा रहा है
सच ये है कि आम आदमी कंट्री में अपने दिन गिन चूका है
आम होने का कॉपीराइट तो उस से कब का छिन चूका है
किसी पार्टी का समर्थक होना तो उसकी मजबूरी हो गया है
सर्वाइव करने के लिए ये क्राइटेरिया भी अब ज़रूरी हो गया है
मास्टरस्ट्रोक बता कर जो वाही-वाही लूट रहे है
अब फैक्ट्स जस्टिफाई करने में उन्ही के पसीने छूट रहे है
मैं भी जज़्बाती होकर थोड़ा-थोडा रैशनल हो जाता हूँ
माफ़ करना कभी-कभी में एंटी नेशनल हो जाता हूँ


