
हज़ारों तारीखों मे बस याद एक तारीख़ रह गई
कि मिटाने पर भी लाख, यादें कुछ बारीक रह गई
वक्त मे लपेट कर रख छोड़े थे लम्हे जहाँ हमने
वहीं देखा तो नम आन्खो मे दबी एक चीख रह गई
वो चाय कि प्यालि वो यार वो सिगरेट के छल्लों कि अमीरि अब कहाँ 'प्रकाश'
बहुत मान्ग्ग्ने पर भी न मिल सकि जो उन लम्हो कि भीख रह गई
मन्ज़िलो कि तलाश मे क
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