कुछ था बीच, शायद प्यार, याद है या भूल गये भूल जाने का और याद ना आने का क़रार, याद है या भूल गये मौक़े तो बहुत दिए क़िस्मतों ने मुलाक़ातों के मौक़े दस्तूरन सामनो के और अधूरी बातों के मिल तो सकते थे कई बार हम तुम मगर जो तय कि थी तुमने बीच दीवार, याद है या भूल गए भूल जाने का और याद ना आने का क़रार, याद है या भूल गये ख़ूब मंज़र थे वो भी तेरा रूठना मेरा मनाना बिन बात मेरा दूर जाना और तुम्हारा झट से पास आना फिर कब हम इस खेल में जुदा हुए वस्ल के मौक़े तो थे हज़ार, याद है या भूल गए भूल जाने का और याद ना आने का क़रार, याद है या भूल गये मौसमों में भी कहीं तुम छुप आ जाते हो क्या सर्द रातों में अभी भी मुझे तुम बुलाते हो क्या बारिशों में भी तुम ही याद आते हो मुझे मौसम तो बस बिताए थे संग चार, याद है या भूल गये भूल जाने का और याद ना आने का क़रार, याद है या भूल गये आशीष प्रकाश