क़लम उठा और मन से लिख
तू विश्व के कण कण से लिख
ले वेदना संसार की
संवेदना और प्यार की
माँ की करूण पुकार को
और मानवता की हार को
सत्य के दर्पण से लिख
तू विश्व के कण कण से लिख
प्रसन्न करने को नहीं
कहो बात वो जो हो सही
सियाही तेरी निर्दोष है
है कवि ही जिसमें जोश है
मन में छुपे बचपन से लिख
तू विश्व के कण कण से लिख
अज्ञानता चहुओर है
और मन में सबके चोर है
निर्धन के भी जीवन का हो
वर्णन सभी जन जन का हो
बस मन की सुन ना धन से लिख
तू विश्व के कण कण से लिख
‘प्रकाश’ भी निराश है
युग का ये सारांश है
नैतिकता जो खो रही
मानवता जो सो रही
लेखनी सब कह रही
बन रुधिर अब बह रही
और व्यथित हर क्षण से लिख
तू विश्व के कण कण से लिख