फुरसतो की धूप हो, सुकून की इक छांव हो
सर की नीचे हो ज़मीं, आसमा पे पाँव हो
हसरतों के पेड़ हों, हिम्मतों की खाद हो
शहर हो ख़्वाब का भले, नींद ख़ातिर गाँव हो
इश्क़ कच्चा ही रहे, बचपने की छाप हो
एक तूफ़ाँ की हो ख़्वाहिश, जब समंदर नाँव हो
पीली पत्तियाँ मिलें, या हरी जवान सी
जब भी क़ुदरत से मिलें, एक सा बर्ताव हो
बुझ न पाए हिम्मतें, दफ़्न न हो चाहतें
जी लो हर दिन यूँ की जैसे आज आख़िरी दाँव हो