है सफर ये पतथरो का, फिर भी एक् आस मे हूँ ठोकरे बतला रही है, मन्ज़िलो के पास मे हूँ मील पत्थरो से मिलता चल रहा हूँ नयी चुनौतियों की फिर भी प्यास में हूँ फ़िक्र नहीं है अब कल की मुझे मैं जीना चाहता विजेता इतिहास में हूँ बार बार गिरने पर भी जो न टूटे उस साहसी चींटी के प्रयास में हूँ चल रहा हूँ अकेला ज़रूर मगर खुद जैसे एक कारवां की तलाश में हूँ है सफर ये पतथरो का, फिर भी एक् आस मे हूँ ठोकरे बतला रही है, मन्ज़िलो के पास मे हूँ -आशीष प्रकाश