प्रभु आये थे - व्यंग हास्य निद्रा में मैं गहन था जब एक अद्भुत सा आभास हुआ स्वप्न में आये थे भगवन और बैठना उनके पास हुआ धन्य हुआ हूँ भगवन जो आप स्वयं सपने में आये हैं कुछ प्रश्न से मन में अंकित है, पूछू गर उत्तर लाये हैं ? मंद मंद मुस्काये भगवन बोले तू अज्ञानी है स्वप्न में आया हूँ तब जब तेरी जिज्ञासा पहचानी है पूछ ले जो भी मन में है,बस इतना तुझको ध्यान रहे प्रश्न सामाजिक पूछना मत , की हम भी कभी इंसान रहे इंसानो के मन में जाने क्यों ये प्रश्न उमड़ते हैं दिया इन्हे ये लोकतंत्र जबसे, ये प्रश्न बहुत ही करते हैं दुविधा सी थी मन में की हमसे खेल गए हैं भगवन अब प्रश्नोत्तर का दिया क्यों अवसर विचलित रहे फिर भी मन जब ? मैंने भी चालाकी से अपने प्रश्नो को डाल दिया उत्तर जिनका प्रभु जी ने भी चतुरतम और कमाल दिया पूछा मैंने हे प्रभुवर क्यों नोटेबंदी करवाई थी प्रश्न निजी है क्युकी आपने ही paytm app पढ़वाई थी मैंने पूछा हे भगवन क्यों ट्रैन से अब मैं डरता हूँ गिर गिर जाती है ट्रेने, यात्रा भी अब कम करता हूँ प्रश्न निजी एक और कहुँ तो GST भी बहुत ही चुभता है महंगाई की मार में क्यों ये दर्द बड़ा ही दुखता है ? फिर से अब मुस्काये भगवन बोले तुम समझ न पाओगे मुस्काता हूँ जो अब मैं तो तुम भी अब मुस्काओगे देश में देख विचित्र सा तेरे दौर सियासी चलता है प्रश्न जो करता है ज्यादा वो टैक्स भी ज्यादा भरता है gst कुछ नहीं है पगले बस इस समय की माया है इन्ही कारणो से तो तुमने अच्छे दिन को बुलाया है ? अट्ठाइस परसेंट पे क्यों तुम ऐसे आंहे भरते हो ऑक्सीजन तो मिल रही है तुमको? फिर किस बात से डरते हो ट्रैन जो गिरती हैं ये एक सांस्कृतिक पहचान है जगह से अपने हट के देती जापानी ट्रैन को मान हैं नोटबंदी में मंदिर मेरे भी बहुत चढ़ावा आया था कई तो बाबाओ ने उसी से राज महल बनवाया था पकडे जाने वालो को ऐसा लुप्त किया सरकारो ने ढूंढ रहा हूँ उनको आज भी मैं संसद के गलियारों में रहा प्रश्न जो तेरा तू अब बस एक वोट सा दीखता है तू अब सबको उस बेकार हजार के नोट सा दीखता है अब जिज्ञासा मेरी और बढ़ी और पुछा मैंने प्रश्न प्रबल कहाँ पे काला धन पंहुचा है, क्यों न आया खाते में चल? १५ लाख आने हैं मेरे ऐसा किसी ने बतलाया था जुमला कह के उसको फिर कभी शाहो ने झुटलाया था !! ये सुनना था की भगवन भी अब क्रोधित हो जाते हैं बोले तू है बड़ा मूढ़ , तुझे ये पैसे नज़र न आते हैं ? इन पैसो ने न जाने कितनो का कल्याण किया याद नहीं एक पत्रकार ने एक नव चैनल निर्माण किया ? अब उदास सा मन था किन्तु हिम्मत अभी भी बाकी थी शायद प्रभु ने मेरी जिज्ञासा कुछ कम सी आंकी थी पूछा मैंने हे प्रभु क्यों मुझको आप पक्षपाती से दिखते हैं बोले हंस के मूरख हम तो स्वयं बाज़ार में बिकते हैं पक्षपात तो काम बचा अब तुम जैसे इंसानो का भक्ति में तुम लगे हो झूठी, ये दोष न है भगवानो का न डेरो में ढूंढो मुझको न खोजो मुझको रैली में मिलता हूँ मैं ढूंढ सको गर स्वयं की आत्मा मैली में प्रश्नो के उत्तर में मैंने तुमको ये बतलाया है ये दौर तुम्हारे ही समाज की मौनबिंदु का जाया है आशीष ' प्रकाश '