मौला
मेरी भूल समझ के ऐ मौला
एक फूल समझ के ऐ मौला
मैं बाग़ लगाने आया हूँ
कुछ दाँव लगाने आया हूँ
फुटपाथ पे बैठे अपनों को
धूमिल से पड़े कुछ सपनो को
परियो की कही उस दुनिया की
पहचान बनाने आया हूँ
कुछ दाँव लगाने आया हूँ।
इस ईट पत्थरो की कश्ती में
मुर्दो से भरी इस बस्ती में
मैं आग लगाने आया हूँ
कुछ दाँव लगाने आया हूँ
इस आग में अजब सी गर्मी है
सर्द जज़बात की नरमी है
इंसानी हर उस रिश्ते को
तेरी हस्ती को सीखाने आया हूँ
कुछ दाँव लगाने आया हूँ।
मेरे गम में जहाँ तू भी रोये
हसु अगर मैं तो खुश तू होये
हर दर्द जहाँ अपनाता हो
रिश्तो की समझ का नाता हो
फीकी सी पड़ी तस्वीरो में
मैं रंग सजाने आया हूँ
कुछ दाँव लगाने आया हूँ
ये पंक्तिया समर्पित हर उस जवान को जो बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में बैंको का कर्ज़दार बन गया
मेरे दाँव पे अपने रिश्ते हैं
कुछ क़र्ज़ में डूबी किश्ते हैं
किश्तों में खरीदी खुशहाली
साँसे इस दौड़ के नाम ही कर डाली
इस दौड़ में मैं न अकेला था
यहाँ मुझ जैसो का मेला था
कोई किसी को पीछे छोड़ गया
फिर अगले को जीतने दौड़ गया
कब थमती है ये दौड़ बता
तू मिलता है किस मोड़ बता
मैं तेरी बनावट हु मौला या तू मेरी बनावट है
जिस मोड़ मिलेगा तू मुझको
कहीं पूछ न बैठु मैं तुझसे
दोनों ने बनाया दोनों को
बता कौन किसे पहले पूजे।
-आशीष 'प्रकाश'
