मैं भारत में लोकतंत्र की बस अंतिम सी निशानी हूँ
मैं हूँ दिल्ली मैं ही इस भारत की राजधानी हूँ
खूब लुटी हूँ खूब हूँ टूटी, अब हो गई सयानी हूँ
मैं हूँ दिल्ली मैं ही इस भारत की राजधानी हूँ
देखे हैं खून के धब्बे भी और झेले मैंने पत्थर भी
देखा है पृथ्वीराज को तो देखा है मैंने अकबर भी
जीत के बहुमत जो नेतागण इठला के मुझमे आते हैं
रोज़ हूँ देखती विकास के नाम पर वो कितने गांव खा जाते हैं
मंदिर मज़्जिद के नारो को हररोज जंतर मंतर झेल रहा
विज्ञान छोड़ बन गया धरनास्थल, और अब भविष्य से खेल रहा
धो धो के पाप हो गई जो काली, उसी यमुना का पानी हूँ
मैं हूँ दिल्ली मैं ही इस भारत की राजधानी हूँ
दुनिया देखती राजपथ मुझमे और देखती मुझमे लाल किला
नहीं देखती है कितने मजदूरों का खून मुझमे बहा जला
नहीं देखती मुझमे दुनिया देओली जैसी बस्ती को
देखती है तो CP में बीतती रंगीन रातों की मस्ती को
नहीं पूछता कोई भी की कहाँ कहाँ निर्भया रोई थी
कोई न जाने कब कितनी बार मैंने कहाँ कहाँ इज़्ज़त खोई थी
टँगी जहाँ पे खाकी कई बार उन्ही रंगीन गलियों की रानी हूँ
मैं हूँ दिल्ली मैं ही इस भारत की राजधानी हूँ
मैं हूँ दिल्ली मैं ही इस भारत की राजधानी हूँ