लौटता बचपन एक दादा अपने पोते के साथ अपनी दोस्ती के रिश्ते को कैसे बयां करता है, इसकी झलक दर्शाने की मैंने एक नन्ही कोशिश की है- मेरी उम्र का मेरे इस घर में सिर्फ मेरा पोता है मेरी उम्र का मेरे इस घर में सिर्फ मेरा पोता है अक्सर दोनों की सुनी तब ही जाती है- जब मैं रोऊ या वो रोता है मेरी उम्र का मेरे इस घर में सिर्फ मेरा पोता है.... हूँ अब भी जवाँ मैं, ये मुझे सिर्फ वो ही याद दिलाता है जब भी थक के लेटता हूँ - कभी बॉल तो कभी बल्ला पकड़ाता है कूद पड़ता है सीने पे मेरे, न करता है मेरी उम्र का लिहाज़ आज वही है जो बात करने से पहले नहीं पूछता मेरी तबियत और मिज़ाज़ खा भी लेता है संग मेरे कुछ निवालो को है वही जो अक्सर तोड़ता है मेरे मौन के सारे तालो को दवाइयों का अब काम नहीं शायद..... दवाइयों का अब काम नहीं, सोता हूँ चैन से जब वो सोता है, सच है की मेरी उम्र का मेरे इस घर में सिर्फ मेरा पोता है मेरी उम्र का मेरे इस घर में सिर्फ मेरा पोता है ...... Ashish prakash ये कविता मेरे पूज्य पिताश्री स्व महेश चन्द्र सक्सेना को बहुत प्रिय थी. मेरे लिखी हुई तमाम लेखो मे उनहे ये सर्वश्रेष्ट लगा था. उनहोने ये अपने देहांत के मात्र 4 दिन पेहले मेरे मुह से सुनी और कहा 'ये अब तक की तुमहारी सबसे अच्छी रचना है ' इस कविता की पहली पंक्ती का श्रेय महान शायर श्री सयद मुनववर राना के एक साक्षातकार को जाता है, ज़िसमे उनहोने कहा था की 'कई बांर मुझे ऐसा लगता है मेरे घर मे मेरी उम्र का सिर्फ मेरा पोता है ' इस एक पंक्ती से प्रभावित हो दादा पोते के रिषते को मैने अपने घर मे जिस तरह पनपते देखा था उसी तरह अपने ज़जबात आपके समने रख दिये. अफसोस रहा की इस रिषते की उम्र महज़ 3 साल और कुछ महिने रही.