
कानपुर का ज़ाया हूँ और दिल्ली ने पाला
दो माँओं का प्यार मिला, मैं हूँ क़िस्मत वाला
एक ने दी तहज़ीब, तो दूसरे ने हिम्मत
एक ने तालीम आज़माई और दूजे ने क़िस्मत
एक ने खुली धूप में खेलना सिखाया
तो दूजे ने बेंच पे सुलाया
एक ने प्यारी से परखा तो दूसरे ने थपेड़ों से आज़माया
विक्रम पे सिकुड़ के बैठ लेता हो जो
उसके लिए भाग के बस पकड़ना था क्या निराला
दो माँओं का प्यार मिला, मैं हूँ क़िस्मत वाला
किसी ने कहा अपना
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