कानपुर का ज़ाया हूँ और दिल्ली ने पाला दो माँओं का प्यार मिला, मैं हूँ क़िस्मत वाला   एक ने दी तहज़ीब, तो दूसरे ने हिम्मत एक ने तालीम आज़माई और दूजे ने क़िस्मत   एक ने खुली धूप में खेलना सिखाया तो दूजे ने बेंच पे सुलाया एक ने प्यारी से परखा तो दूसरे ने थपेड़ों से आज़माया   विक्रम पे सिकुड़ के बैठ लेता हो जो उसके लिए भाग के बस पकड़ना था क्या निराला दो माँओं का प्यार मिला, मैं हूँ क़िस्मत वाला   किसी ने कहा अपनाती नहीं है दिल्ली बाहर वालों को रास आती नहीं है दिल्ली   कानपुर की ट्रेनों में भर कर आ जाते हो बड़े शहर में बस भीड़ बढ़ाते हो   पर जिन परिंदो के उड़ने के अरमान होते हैं उनके लिए सामने कई आसमान होते हैं   कोशिश करने वालों को ही आज़माती है दिल्ली थपेड़ों के बाद ही दिल से लगाती है दिल्ली   कोई बता दो अँधियो को कानपुर के लड़के ने अभी है बस डेरा डाला दो माँओं का प्यार मिला, मैं हूँ क़िस्मत वाला