उचित समय पर रुक जाना ही जीवन का आधार सही
वर्तमान की राजनीती ही अब कविता का सारा सार सही
भूढ़े बरगद जैसे लटाओ का बोझ क्यों काँधे रखा है
लोकतंत्र में भी क्यों परिवारों के मोह को बांधे रखा है
आरक्षण खा गया हमें फिर भी क्यों ये मोह नहीं त्यागा
गाँधी नाम रख कर भी तुम में देशप्रेम नहीं जागा
हमने सरकारों में तो सिर्फ नौकरशाही देखी है
ताजो और तख्तो को बचाते खूब तबाही देखी है
देख चुके हम नरसंहार और युद्ध के काले बादल भी
अश्रु नयन के पोछ रहा है आज कवी का आँचल भी
फिर भी तुमको आज युवा की बोली चुभने लगती है
कवियों की आवाज़ तुम्हे कानो को दुखने लगती है
जेलों में भर दो तुम चाहे आवाज़ दबा के कैद करो
जो दे सच सुनने की शक्ति, मेरी मानो ऐसा वैद करो
जब जब सरकारी बंदिश देश में जन आवाज़ दबाएगी
तब तब हर कवी की चेतना सिर्फ राग द्वेष ही गाएगी
जो नहीं सुन सकते हो तुम सच तो अब कुर्सी से उतर जाओ
और चाहो सुनना गर वंदन गीत तो बेहतर है की सुधर जाओ
नहीं सुनते जो विनती तो सुन लो अब तुम ललकार सही
वर्तमान की राजनीती ही अब कविता का सारा सार सही
-आशीष प्रकाश