द्रौपदी वस्त्र की आन कहाँ कलयुग में घनश्याम कहाँ   मस्जिद में भी लुटती है मंदिर में भी घुटती है   इज़्ज़त बस नारी की है कभी मिटती है कभी बिकती है   और कौन नहीं ख़रीदार यहाँ हर शक्स खड़ा मक्कार यहाँ   कोई ख़रीदे दामो में कोई भरे गोदामों में   कोई ख़बर बनाके  बेच रहा कोई कोर्ट में जाके नोच रहा   और धंधा सबका चलता है देश कहाँ ये बदलता है