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इज़्ज़त का धंधा है साहब

द्रौपदी वस्त्र की आन कहाँ कलयुग में घनश्याम कहाँ   मस्जिद में भी लुटती है मंदिर में भी घुटती है   इज़्ज़त बस नारी की है कभी मिटती है कभी बिकती है   और कौन नहीं ख़रीदार यहाँ
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