इस दुनिया में मेरा कोई घर नहीं है
इस दुनिया में मेरा कोई घर नहीं है
न ताले न फिकरे न आंसू न रंजिश
न जीत कि आदत, न हार कि बन्दिश
बस एक मुसाफिर सा गुज़रा यहाँ से
वही रैन बीती, सूरज उतरा जहाँ से
पर मेरा तो कोई रहबर नहीं है
इस दुनिया में मेरा कोई घर नहीं है
न स्वर्ग का लालच न नर्क की चिंता
न देखूँ मैं रस्ता, न ठोकर हूँ गिनता
न दोस्त रहा न दुश्मन किसी का
न मोह के धागो का बंधन किसी का
मस्ती में अपनी मलंग सा हुआ हूँ
न पकड़ो मुझे, मैं धुआँ ही धुआँ हूँ
पर इस धुएं का कोई लश्कर नहीं है
इस दुनिया में मेरा कोई घर नहीं है
हाँ मुझको भी कहीं एक पड़ाव मिला था
ख्वाबो का रेतीला एक् गांव मिला था
बना अपने सपनो के महल रहा था
पर रेत का घर तो दहल रहा था
रेत कि फितरत मे तो फिसलना ही था
मुझे तो फिर रास्तों मे मिलना ही था
चली एक आंधी तो सपना भी टूटा
हाथ भी छूटे वो अपना भी छूटा
अब सपनो का कोई बिस्तर नहीं है
इस दुनिया में मेरा कोई घर नहीं है
मेरी मंजिल कहाँ अब मुसाफिर ही समझो
मुझे अब तो वाइस, बस काफिर ही समझो
बिस्तर में नहीं, अब हूँ बस्तों में जीता
न ढूंढो शहरों में , हूँ रस्तों में जीता
जलती बाती की तरह गला जा रहा हूँ
की जब तक हूँ ज़िंदा चला जा रहा हूँ
ज़िन्दगी अब सफर से तो बेहतर नहीं है
इस दुनिया में मेरा कोई घर नहीं है
आशीष प्रकाश